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क्यों माना जाता है गुरु को सर्वाधिक शुभ ग्रह ?

ज्योतिष शास्त्र में गुरु को सर्वाधिक शुभ ग्रह माना गया है |यह धनु और मीन राशियों का स्वामी है |यह कर्क राशि में उच्च का तथा मकर में नीच का माना जाता है | धनु इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |बृहस्पति अपने स्थान से पांचवें ,सातवें और नवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को परम शुभकारक कहा गया है |

जनम कुंडली में गुरु दूसरे ,पांचवें ,नवें ,दसवें और ग्यारहवें भाव का कारक होता है | गुरु की सूर्य ,चन्द्र ,मंगल से मैत्री ,शनि से समता और बुध व शुक्र से शत्रुता है |यह स्व ,मूल त्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में ,गुरूवार में ,वर्गोत्तम नवमांश में,उत्तरायण में ,दिन और रात के मध्य में ,जन्मकुंडली के केन्द्र विशेषकर लग्न में बलवान व शुभकारक होता है |

बृहस्पति को गुरु भी कहा जाता है I

बृहस्पति ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है I यह पीले रंग का प्रतिनिधित्व करता है | जिन लोगों की कुंडली में गुरु का प्रभाव अधिक होता है वे अध्यापक, वकील, जज, पंडित, प्रकांड विद्वान् या ज्योतिषाचार्य हो सकते हैं | सोने का काम करने वाले सुनार, किताबों की दुकान, आयुर्वेदिक औषधालय, पुस्तकालय, प्रिंटिंग मशीन आदि पर गुरु का अधिकार होता है |

गुरु एक नैसर्गिक शुभ ग्रह है तथा यह जहाँ भी बैठता है उस स्थान को पवित्र कर देता है | सभी तीर्थस्थल इसी ग्रह के अंतर्गत आते हैं | पूर्ण रूप से ब्राह्मण धर्म का पालन करने वाले पंडित, न्यायपालिका के अंतर्गत आने वाले सर्वोच्च पद यानी न्यायाधीश, सरकारी वकील, साधू संतों में प्रमुख, कागज़ का व्यापार करने वाले व्यापारी तथा गजेटेड अधिकारी गुरु द्वारा ही संचालित होते हैं |

गुरु से प्रभावित व्यक्ति हृष्ट पुष्ट या थोड़े मोटे हो सकते हैं I इनका शरीर विशाल होता है | ये झूठ आसानी से नहीं बोल सकते अपितु बात को घुमा फिर कर बोलते हैं | इनका क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण होता है | यह लोग तामसिक प्रवृत्ति के नहीं होते I इनका चरित्र तथा आचरण पवित्र तथा सहज होया है I ये झूठी प्रशंसा, दिखावे से दूर रहने वाले तथा धार्मिक कार्यों में रूचि रखने वाले होते हैं Iयही कारण है कि गुरु जिस ग्रह को देखेगा वह भी बलवान हो जाएगा |

पाप ग्रह के साथ होने पर वकील जो कि झूठ की राह पर ही चलता है, भ्रष्ट नेता, सोने का स्मगलर, रिश्वतखोर अधिकारी, तांत्रिक बना सकता है | फल देने का समय :- गुरु अपना शुभाशुभ फल १६ से २२ एवम ४० वर्ष कि आयु में ,अपनी दशाओं व गोचर में प्रदान करता है | प्रौढ़ावस्था पर भी इस का अधिकार कहा गया है |गले में व्यक्ति माला पहनने की आदत डाल लेता है। सोना खो जाए या चोरी हो जाए। बिना कारण शिक्षा रुक जाए। व्यक्ति के संबंध में व्यर्थ की अफवाहें उड़ाई जाती हैं। आँखों में तकलीफ होना, मकान और मशीनों की खराबी, अनावश्यक दुश्मन पैदा होना, धोखा होना, साँप के सपने। साँस या फेफड़े की बीमारी, गले में दर्द। 2, 5, 9, 12वें भाव में बृहस्पति के शत्रु ग्रह हों या शत्रु ग्रह उसके साथ हों तो बृहस्पति मंदा होता है।

यदि बृहस्पति अच्छा हो तो निम्न लक्षण दिखाई देते है:-

व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता। उनकी सच्चाई के लिए वह प्रसिद्ध होता है। आँखों में चमक और चेहरे पर तेज होता है। अपने ज्ञान के बल पर दुनिया को झुकाने की ताकत रखने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रशंसक और हितैषी बहुत होते हैं। यदि बृहस्पति उसकी उच्च राशि के अलावा 2, 5, 9, 12 में हो तो शुभ।

रत्न धारण :- पीत रंग का पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी मेंपुनर्वसु ,विशाखा ,पूर्व भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर गुरुवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली में धारण करें | धारण करने से पहले ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , पीले पुष्प, हल्दी ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |पुखराज की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न सुनैला या पीला जरकन भी धारण कर सकते हैं | केले की जड़ गुरु पुष्य योग में धारण करें . दान व्रत ,जाप :- बृहस्पतिवार का गुरूवार के नमक रहित व्रत करना चाहिये। पुखराज, कांसा, सोना, चने की दाल, खांड, घी, पीला फूल, पीला कपड़ा, हल्दी, पुस्तक, घोड़ा, भूमि तथा पीले फल का दान करना चाहिये। ऊँ ऐं क्लीं बृहस्पतये नमः का जप कम से कम 19000 बार अवष्य करना चाहिये।

गुरूवार को घी, हल्दी, चने की दाल ,बेसन पपीता ,पीत रंग का वस्त्र ,स्वर्ण, इत्यादि का दान करें | बृहस्पतिवार की संध्या काल मे 05 से 06 रत्ती का पुखराज अथवा उपरत्न सुनहला, प्रतिष्ठित कराकर धारण करने से अशुभ बृहस्पति का प्रभाव कम होता है। बृहस्पति जी वृद्धिदायक ग्रह है विद्या, सन्तान, धर्म आदि की वृद्धि के लिये बृहस्पति जी शुभ रहना अति अनिवार्य है। ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः मन्त्र का जप भी 19000 की संख्या मे कर सकते हैं। फलदार पेड़ सार्वजनिक स्थल पर लगाने से या ब्राह्मण विद्यार्थी को भोजन करा कर दक्षिणा देने से भी बृहस्पति प्रसन्न हो कर शुभ फल देते हैं | पीपल में जल चढ़ाना। सत्य बोलना। आचरण को शुद्ध रखना। पिता, दादा और गुरु का आदर करना। गुरु बनाना। घर में धूप-दीप देना। ज्योतिषाचार्य सुनील चोपड़ा  

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